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अस्मा जहांगीर, पाकिस्तान की वो कार्यकर्ता और वकील जिसने अकेले दम पर पाकिस्तान को मानवाधिकार का पाठ पढ़ाया: यूएन ने किया है मानवाधिकार पुरस्कार से सम्मानित

अस्मा जिलानी जहांगीर (जन्म, 27 जनवरी 1952 – मृत्यु, 11 फरवरी 2018), ये वो नाम है जिसे सुनकर हर किसी को मानवाधिकार के लिए लड़ने वाली एक वकील और सामाजिक कार्यकर्ता का स्मरण हो पड़ता है। यह उस महिला का नाम है जिन्होंने पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की सह-स्थापना और अध्यक्षता की और पाकिस्तान जैसे देश को मानव अधिकारों के बारे में सोचने पर मजबूर किया। विश्व भर में जानी और मानी गयी अस्मा जहांगीर को आखिरकार हाल ही में वर्ष 2018 के लिए मरणोपरांत संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इसी वर्ष फरवरी में उनकी मृत्यु के पश्च्यात, उनके जीवन के बारे में बहुत कुछ लिखा गया और उनकी अहमियत के बारे में लोगों को मालूम भी कराया गया। अस्मा ने एक समृद्ध विरासत पीछे छोड़ी है, जिसे सम्मान दिया जाना चाहिए। वह मानवाधिकार रक्षकों और डेमोक्रेट के लिए हमेशा एक आदर्श मॉडल रही हैं और आगे भी रहेंगी, और यह पुरस्कार का उन्हें नवाजा जाना इस बात को साबित भी करता है।

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चायपानी हिंदी के माध्यम से इस लेख में हम उनके बारे में वो सब कुछ जानने की कोशिश करेंगे, जिसके चलते उन्हें मानव अधिकारों के लिए लड़ने वाली एक महान शख्सियत के रूप में जाना जाता है। इस लेख में हम उनका एक छोटा सा परिचय पेश करने का प्रयास कर रहे हैं, और इस बात को रेखांकित करने का प्रयत्न कर रह हैं कि एक महिला होने के नाते उनके संघर्ष और सत्ता के विरुद्ध लड़ाई के लिए उन्हें किसी टीम अथवा सहारे की आवश्यकता नहीं पड़ी, वरन वो अकेले दम पर अन्याय के खिलाफ अपनी लड़ाई में ताउम्र लगी रहीं।

एक वकील के रूप में, कई बार मैंने अल्पसंख्यकों और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मुश्किल और संवेदनशील मामलों को उठाया। हां, मुझे लगातार धमकियाँ मिलती रहती हैं, और अगर मैं सच कहूं तो यह सब कभी-कभी बहुत डरावना होता है। लेकिन मुझे अपना काम जारी रखना है।

आसमा जहांगीर ने यह बात उस समय कही जब वो युद्ध स्तर पर शोषितों के मानव अधिकारों के लिए लड़ रही थी। उन्हें यह भय नहीं था कि उनकी जान पर खतरा कितना है, उन्हें यह बेचैनी थी कि उनकी लड़ाई निरंतर जारी रहनी चाहिए। हाल में उन्हें जब यूनिटेड नेशंस के इस पुरस्कार से नवाजा गया तो पूरा विश्व उनकी काबिलियत के आगे नतमस्तक होता हुआ प्रतीत हुआ। अन्याय के खिलाफ उनका कठोर अंदाज़ बचपन से ही साफ़ था।

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उनके बचपन से जुड़ा एक किस्सा अक्सर सुनाया जाता है। जब वे जब छह वर्ष की थी तब उनके राजनेता पिता, मलिक गुलाम जिलानी ने वर्ष 1958 में अयूब खान के मार्शल लॉ का विरोध किया था। वर्ष 1971 में, जब उनके पिता को एक अन्य सैन्य तानाशाह, याह्या खान ने गिरफ्तार किया था, तो अपनी किशोरावस्था में रहीं अस्मा ने तब लाहौर उच्च न्यायालय में अपने पिता की रिहाई के लिए याचिका दायर की थी (अस्मा जिलानी बनाम पंजाब सरकार)। यह मामला पाकिस्तान के लिए आगे चलकर एक लैंडमार्क केस साबित हुआ।

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जहाँ उनका पूरा जीवन तमाम प्रकार के सामाजिक कार्यों से जुड़ा रहा, वहीँ कुछ मामलों में उनकी भूमिका अतुलनीय रही। अस्मा एक समर्पित नारीवादी (Feminist) थी जो सभी लिंगों की समानता के लिए लड़ाई लड़ने में सबसे आगे रहती थी। उन्होंने ज़िआ-उल-हक़ के हुडूद (Hudood) अध्यादेश का जोरदार विरोध किया था। इस अध्यादेश ने व्यभिचार और बलात्कार के बीच की रेखाओं को धुंधला कर दिया और जिन महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया गया था, उन्हें दण्डित करने के प्रावधान किया।

हुडूद अध्यादेश वर्ष 1979 में पारित किया गया था, और इसके पारित होने के कुछ सालों के भीतर ही, पाकिस्तान की जेलें, उन महिलाओं से भर गयी जिन्हे इस अध्यादेश के तहत दोषी पाया गया था। इन कानूनों में संशोधन करने के लिए देश में 27 साल तक कानूनी और राजनीतिक संघर्ष हुआ। अस्मा ने इस संघर्ष का पूरी ताकत से नेतृत्व किया और उन महिलाओं की मदद भी की जो हुडुद कानून के कारण कैद में थी।

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वह अक्सर महिलाओं के मामलों को लेकर अदालतों में जाती थी, जिसके चलते अस्मा, देश के शक्तिशाली परिवारों, सामंती और धार्मिक अभिजात वर्ग के खिलाफ एक आवाज़ बन चुकी थीं। वास्तव में पाकिस्तान का अल्पसंख्यक समूह, यह बात हमेशा याद रखेगा कि अस्मा ने ईशनिंदा के आरोपियों के मामलों को कैसे उठाया – वे लोग जो अन्यथा बिना किसी वकील के जेलों में फंस गए थे या अतिरिक्त न्यायिक तरीके से हत्या कर चुके थे।

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मानव अधिकारों के लिए लड़ने वाली वकील, अस्मा को सत्ता में बैठे लोगों से सच बोलने और कमजोर और हाशिए पर मौजूद महिलाओं और अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ खड़े होने और उनकी रक्षा करने के लिए प्रतिष्ठा हासिल हुई थी। उन्होंने एक ऐसे देश में रहते हुए अंतर्राष्ट्रीय प्रशंसा हासिल की जिस देश में उदार और धर्मनिरपेक्ष आवाज लगातार खतरे में पड़ रही थी।

यह पुरस्कार उन्हें मरणोपरांत अवश्य मिला है लेकिन यह एक बेहद मुख्य बात को दर्शाता है, वह यह कि आपके महान कार्यों को यह दुनिया कभी नहीं भूलती, भले आप इस दुनिया को छोड़ कर जा चुके हों। इस पुरस्कार से नवाजा जाना यह साबित करता है कि आज के युवा पुरुषों और महिलाओं ने, जिन्होंने अस्मा को सत्ता में काबिज़ लोगों और पितृसत्ता के समर्थकों का विरोध किया है, उन्हें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अस्मा ने अपने नेक कार्य के चलते अंतर्राष्ट्रीय बंधुता में कितना सम्मान अर्जित किया था। हम सबको उनका एकमात्र योद्धा के रूप में अपने प्रयासों और कट्टरता के खिलाफ सबसे बड़ी आवाज के तौर पर उभारना, हमेशा याद रखना होगा।

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Sparsh Upadhyay

एक विचाराधीन कैदी हूँ। कानून की पढ़ाई भी की है। जितना पढ़ता हूँ, कोशिश रहती है कि उतना ही लिखूं भी। सच्चाई, ईमानदारी और प्रेम को दुनिया की सबसे बड़ी ताकत समझता हूँ।

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