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एक मजदूर पिता का वो बेटा जिसने यूथ ओलंपिक में दिलाया भारत को स्वर्ण पदक: जेरेमी लालरिननुगा

यह कहा जाता है कि सफलता, किसी मेहनतकश व्यक्ति की तलाश में संघर्ष के रास्ते पर घूमती है और जब उसे कोई अपने जैसा काबिल व्यक्ति मिल जाता है तो वह उसे सम्मान से सराबोर करदेती है। यह मायने नहीं रखता कि आप किस जगह से हैं और क्या कर रहे हैं, मायने यह रखता है कि आप अपने सपने को पाने के लिए संघर्ष कर रहे हों। जेरेमी लालरिननुगा, इस विचार की एक जीती जागती मिसाल हैं। उनके पिता, जो स्वयं खेल (बॉक्सिंग) से जुड़े रहे हैं लेकिन आर्थिक स्थिति ठीक न होने के चलते उन्हें बॉक्सिंग क्षेत्र में बहुत ज्यादा दूर जाने का मौका नहीं मिल पाया लेकिन अपने बेटे का खेल में जाने का उन्होंने पूरा समर्थन किया। और इसके बाद उन्होंने बेटे की हर संभव मदद भी की।

जेरेमी के पिता, ललनिहतलुआंग जो स्वयं एक काबिल बॉक्सर रहे हैं और उन्होंने नेशनल स्तर तक कई पदक भी जीते, लेकिन आर्थिक स्थिति के चलते आगे नहीं बढ़ सके। पैसे कमाने के लिए उन्हें पीडब्लूडी विभाग में एक लेबरर के तौर पर कार्य करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

लेकिन आमिर खान की फिल्म क़यामत से क़यामत तक के गाने, ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा’ की तरह ही, इस कहानी में भी पिता को हमेशा से बेटे पर भरोसा था। और संघर्ष के हर सफर के अंत में जैसे मंजिल मिल जाती है, वैसा ही यहाँ भी हुआ। जेरेमी लालरीननुगा ने भारत की ओर से पहला स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया, ब्यूनस आयर्स में हुए युवा ओलंपिक्स में पुरुषों की 62 किग्रा वेटलिफ्टिंग श्रेणी में इन्होने शीर्ष सम्मान सम्मान हासिल किया। 16 वर्षीय जेरेमी ने कुल 274 किग्रा (124 किलो + 150 किलो) का वेट उठाते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया।

सोचिए, कैसा हो अगर आपके पिता, अपने सपने को पूरा करने से महरूम रह गए हों और उनका सपना आप पूरा कर पाएं। बेशक आपके पिता की ख़ुशी का ठिकाना नहीं होगा। यही हुआ जेरेमी के पिता के साथ, वो अपने बेटे की उपलब्धि पर गौरवान्वित हैं और उनके बेटे ने पदक जीतने के बाद कहा कि, “मैं अब अपने पिता को काम नहीं करने दूंगा, अब मैं सीधे उनके पास जाऊंगा और कहूंगा कि उनके घर बैठ कर आराम करने के दिन आ चुके हैं।”

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संघर्ष से तोड़ी रुकावटों और मुश्किलों की दीवार

‘बांस तकनीक’ सीख चुके जेरेमी को बचपन से ही वेट लिफ्टिंग केंद्र में जाने के शौक पैदा हुआ जहाँ वो बॉडी बिल्डर्स को भार उठाते देखा करते थे और तमाम कसरतों के प्रति आकर्षित हुआ करते थे।

“एक बार मैंने वहां कसरत करने वाले एक भैया से पूछा कि क्या वो मुझे भार उठाना सिखाएंगे? उन्होंने हाँ कहा और फिर उस दिन के बाद से मेरी जिंदगी पूरी तरह से बदल गयी,” उत्साह से भरे जेरेमी बताते हैं।

जिस किस्से की बात जेरेमी कर रहे हैं, इसके घटने के कुछ दिनों बाद ही उनके शहर में एक नया वेट लिफ्टिंग केंद्र खुला। स्वयं जेरेमी के शब्दों में, “मैं वास्तव में बहुत उत्साहित था और मैंने तुरंत मालसवमा (जेरेमी के पहले कोच) से संपर्क किया। मालसवमा वही हैं, जिन्होंने मुझे पेशेवर भारोत्तोलन के सबक दिए।”

जेरेमी बताते हैं कि मालसवमा ने मुझसे एक बांस लाने के लिए कहा और फिर उसे धीरे-धीरे उठाने के लिए कहा। वो 5 मीटर लंबा और 20 मिमी चौड़ा बांस था। उस पर किसी प्रकार का अतिरिक्त भार नहीं था, लेकिन वजन से ज्यादा मुश्किल उस एक छड़ी को उठाना था, क्योंकि ऐसी स्थिति में आपको पता होना चाहिए कि इसे संतुलित कैसे करें। उनके लिए यह काफी कठिन था।

युवा ओलंपिक 2018 स्वर्ण पदक विजेता ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, “मैंने दिन-रात अभ्यास किया, बांस की छड़ें उठाई और संतुलन की कला सीखी। संतुलन कला सीखने के बाद, मुझे भार उठाने के लिए कहा गया था। इस तरह मैंने अपना भारोत्तोलन करियर शुरू किया।”

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कठिन ट्रेनिंग पूरी करके पहुंचे पुणे के आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टिट्यूट (ASI)

उनके सबसे प्रथम कोच मालसवमा ने उन्हें 8 महीने की कठिन और संघर्षशील ट्रेनिंग से गुजरने का मौका दिया। उसके बाद वे स्वयं इस बात को लेकर आश्वस्त हो गए कि जेरेमी अब बड़े स्तर पर ट्रेनिंग के लिए पूरी तरह से तैयार हो चुके हैं। वो स्वयं जेरेमी को लेकर पुणे के आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टिट्यूट पहुंचे और देश भर से इस संस्थान में प्रवेश पाने वाले 3 लोगों में से 1 जेरेमी रहे।

वहां उन्हें जारजोकेमा नाम के कोच मिले जिन्होंने उन्हें वेट लिफ्टिंग की बारीकियां सिखाई। हालाँकि जेरेमी हमेशा कहते हैं कि “मैं अपने प्रथम कोच मालसवमा का पूरे जीवन आभारी रहूँगा, उनके बिना यह सब कुछ संभव नहीं हो सकता था।”

जरजोकेमा सर के मार्गदर्शन में उन्होंने पटना में उप-जूनियर नागरिकों में स्वर्ण पदक और फिर मलेशिया में विश्व युवा भारोत्तोलन चैम्पियनशिप में रजत पदक जीता। उजबेकिस्तान में एशियाई युवा और जूनियर चैम्पियनशिप में युवा वर्ग में उन्होंने सिल्वर पदक भी जीता है।

जेरेमी, सही मायनों में युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उनके संघर्ष की कहानी इस लिए भी खास है कि उनकी यह उपलब्धि अतुल्य है और उनकी उम्र (संख्या के मामले में), इस काबिलियत के लिए बहुत नन्ही मालूम पड़ती है। उनकी कहानी उन सभी के लिए बहुत प्रेरणादायक है जो अक्सर कमजोर परिस्थितियों के आगे घुटने टेक देते हैं और अपने सपनो को मजबूरियों की किसी गली में खो देते हैं। जेरेमी इस बात का सबूत हैं कि अगर आप अपने लक्ष्य का पीछा करते रहें तो सफलता आपको जरूर हासिल होती है।

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Sparsh Upadhyay

एक विचाराधीन कैदी हूँ। कानून की पढ़ाई भी की है। जितना पढ़ता हूँ, कोशिश रहती है कि उतना ही लिखूं भी। सच्चाई, ईमानदारी और प्रेम को दुनिया की सबसे बड़ी ताकत समझता हूँ।

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