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हाँ, महिलाएं नहीं हैं दोयम दर्जे की इंसान: सबरीमाला विवाद के बाद आखिर क्यूँ हो रहा है उनके साथ अन्याय?

रेहाना फातिमा, इस नाम से बड़ी संख्या में फ़र्ज़ी ख़बरें फैलाई जा रही हैं। केरल के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की कोशिश करने वाली रेहाना फातिमा को उनकी कौम ने निष्काषित कर दिया गया है। इसके अलावा भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) ने भी उनका तबादला कर दिया है, वो भी ऐसी जगह जहाँ उनका ग्राहकों से कोई संपर्क नहीं रहेगा। वे अभी तक एक टेलिकॉम टेक्नीशियन के तौर पर काम करती थी और बोट जेट्टी शाखा में कस्टमर रिलेशन डिपार्टमेंट में तैनात थीं। अब उन्हें पलारिवट्टम टेलिफोन एक्सचेंज में भेजा गया है। और यह सब क्यों किया जा रहा है? क्यूंकि वो महिला होने के नाते अपने अधिकार को हासिल करने की कोशिश कर रही थी। वह अधिकार जो उन्हें उच्चतम न्यायालय द्वारा संविधान के दायरे में रहते हुए दिया गया है।

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केरल में पेरियार टाइगर रिजर्व में सबरीमाला प्रांगण, भारत के सबसे बड़े तीर्थ केंद्रों में से एक है। इस पूरे इलाके का मुख्य आकर्षण, श्री धर्मस्थस्थ मंदिर है, जो भगवान अयप्पा को समर्पित है। यह इतना आकर्षक है कि आज के दौर में न केवल हर ओर इस मंदिर की चर्चा है बल्कि उच्चतम न्यायलय भी खुदको इस मंदिर से जुड़े एक मामले के प्रति आकर्षित होने से नहीं रोक सका।

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हम आपकी जानकारी के लिए इस मंदिर के इतिहास पर पहले कुछ बातें करलेते हैं, जिसके बाद हम आगे बढ़कर यह समझेंगे कि आखिर क्यों यहाँ लिंग के आधार पर प्रवेश पाना या न पाना, अपने आप में एक बेहद अनुचित परंपरा है जिसका हवाला, यह पितृसत्तात्मक समाज देता आया है।

हाँ तो मामला यह है कि 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं का भगवान अयप्पा के इस मंदिर में प्रवेश निषेध है। कारण? ज्यादा नहीं, बस इतना कि इस उम्र के बीच की महिलाओं को माहवारी (या आम भाषा में ‘पीरियड्स’) नामक अनुभव (‘पीड़ादायक अनुभव’ पढ़ें) से गुजरना होता है। हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह प्रतिबंध कब से प्रभावी है (कुछ लोगों के मुताबिक 800 वर्षों से) और क्यों (अहम् सवाल ‘क्यों’ ही है)। जो लोग इस प्रतिबंध का विरोध करते हैं, वो तर्क देते हैं कि यह महिलाओं के खिलाफ पूर्वाग्रह के अलावा कुछ नहीं है और यह प्रतिबन्ध, माहवारी अनुभव करने वाली महिलाओं को अपमानजनक नजरों से देखता है।

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हालांकि, मंदिर के अधिकारियों और इस प्रतिबंध के समर्थकों का तर्क है कि भगवान अयप्पा ने ब्रह्मचर्य की शपथ ली है और यह प्रतिबंध उनके इस निर्णय का सम्मान करने और देवता को व्याकुलता से दूर रखने का एक उपाय है। वे कहते हैं कि इस अभ्यास को वर्षों से अपनाया जा रहा है, और चूँकि सबरीमाला की तीर्थयात्रा शुरू करने से पहले 41 दिनों तक उपवास रखना आवश्यक होता है (जो मासिक धर्म का अनुभव कर रही महिलाओं के लिए संभव नहीं है), इसलिए यह प्रतिबन्ध जायज है। इसके अलावा मुख्य रूप से यह तर्क भी दिया गया कि महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति देन, उनके एक आवश्यक धार्मिक अभ्यास में हस्तक्षेप होगा।

केरला हिन्दू प्लेसेस ऑफ़ पब्लिक वरशिप (Authorisation ऑफ़ एंट्री) एक्ट 1965 में इस नियम को कानूनी शक्ल दी गयी है, और कानून में ऐसा लिखा गया है कि,

जिन महिलाओं को कस्टम और उपयोग के चलते सार्वजनिक पूजा की जगहों पर प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, वे ऐसे सार्वजनिक पूजा के स्थान पर जाकर पूजा करने की हकदार नहीं हैं।

वर्ष 1991 के बाद इसे और कानूनी समर्थन मिला, जब केरल उच्च न्यायालय ने एक एस. महेंद्रन की याचिका को स्वीकार किया, जिन्होंने शिकायत की थी कि हाल के वर्षों में, सबरीमाला मंदिर में युवा महिलाएं प्रार्थना करती हुई पायी गयी हैं।

अदालत ने मंदिर में महिलाओं पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि यह परंपरा “प्राचीन काल से” अस्तित्व में है और यह परंपरा किसी कानून का उल्लंघन नहीं कर रही है। अदालत ने केरल सरकार को निर्देश दिया कि प्रतिबंध का पालन सुनिश्चित करने के लिए पुलिस का इस्तेमाल करते हुए इस प्रतिबन्ध को लागू किया जाए। साफ़ था कि अदालत स्वयं इस प्रतिबन्ध के पक्ष में थी और महिलाओं के साधारण से अधिकार के खिलाफ भी। और उसकी वजह क्या थी? वही, कि महिलाओं को 10 से 50 उम्र की आयु में मासिक धर्म के अनुभव से गुजरना होता है।

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केरल उच्च न्यायालय का यह फैसला (और बरसों से चली आ रही यह परंपरा) कई सवालों को खड़ा करती थी। क्या वाकई में महिलाएं, मासिक धर्म का अनुभव करते हुए ‘अशुद्ध’ हो जाती हैं? और क्यों, महज़ एक महिला होने के नाते उन्हें पुरुष के ही समान अपनी आस्था के अनुसार किसी भगवान को पूजने का अधिकार नहीं है? इन सभी सवालों को, प्रतिबन्ध का समर्थन करने वाले लोगों द्वारा ‘आस्था, परंपरा और धर्म के अभ्यास’ जैसे बेहद अनुचित कारणों के नीचे दबा दिया जाता है। मसलन, अगर धार्मिक परम्पराओं और बरसों से चले आ रहे धार्मिक अभ्यास में महिलाओं को अयप्पा के सामने पूजा करने का अधिकार नहीं है तो उन्हें किसी भी प्रकार से वह अधिकार नहीं दिया जा सकता है।

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अब सवाल यह उठता है कि भले ही किसी भी धर्म की भावना और परंपरा कितनी भी पुरानी क्यों न हो और भले ही वह परंपरा उस धर्म के लिए कितनी जरुरी क्यों न हो, क्या उसकी आड़ में भेदभाव और अनुचित निर्णयों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए? शायद नहीं, बिलकुल भी नहीं। अगर सोचा जाए तो धर्म के अभ्यास की ‘अनिवार्यता’ (essentiality) के होते हुए भी, संविधान की ‘मूल संरचना’ (Basic Structure) के उल्लंघन में भेदभाव को अनुमति नहीं दी जा सकती है। उच्चतम न्यायालय ने केशवानंदा भारती श्रीपदगाळ्वारु एवं अदर्स बनाम केरल राज्य (1975) के मामले में यह साफ़ तौर पर कहा गया है कि संसद तक को यह अधिकार नहीं कि संविधान की ‘मूल संरचना’ के खिलाफ किसी भी प्रकार का कोई संशोधन किया जाए।

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संविधान की ‘मूल संरचना’ के अंतर्गत आने वाला संविधान का आर्टिकल 25 (1) यह साफ़ तौर पर कहता है कि,

लोक-व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य और इस भाग के अन्य प्रावधानों के अधीन रहते हुए, सभी व्यक्तियों को अन्तः करण (Conscience) की स्वतंत्रता का और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान हक़ होगा।

इसे पढ़ते हुए किसी भी प्रकार से नहीं कहा जा सकता कि हमारा संविधान औरतों को मासिक धर्म का अनुभव करने के दौरान, अपनी आस्था के अनुसार पूजन करने से रोकता है। इसके अलावा, न ही किसी भी प्रकार से औरतों को ‘अशुद्ध’ समझा जाता है। हाँ, संविधान कई मामलों में धार्मिक परम्पराओं को महत्व देता है लेकिन वह महत्व, किसी भी प्रकार के पक्षपात को लागू करते हुए नहीं होगा यह उच्चतम न्यायालय अपने तमाम निर्णयों में कह चुका है।

भले ही यह अभ्यास (प्रतिबन्ध) बरसों से लागू है, लेकिन यह मामला आखिरकार वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच ही गया। दरअसल वर्ष 2006 में यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने इस प्रतिबंध को हटाने की मांग करते हुए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। अगले कुछ सालों में इस मामले को लेकर महज कुछ ही दिनों के लिए सुनवाई हुई, और इस मामले को अंततः तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ को वर्ष 2008 में संदर्भित किया गया। इसके बाद भी यह मामला जनवरी 2016 तक ठन्डे बस्ते में पड़ा रहा।

इस मामले में अंतिम रूप से निर्णय सुनाने से पहले उच्चतम अदालत ने प्रमुखता से इस बात पर विचार किया कि क्या यह अभ्यास भेदभावपूर्ण है और इसलिए यह परंपरा, कानून के समक्ष समानता के अधिकार, धार्मिक भेदभाव से संरक्षण और संविधान में स्थापित मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है? और क्या यह आर्टिकल 25 के अंतर्गत आने वाले “आवश्यक धार्मिक अभ्यास” (essential religious practice) के तहत आती है, धर्म का पालन करने की अनुमति देता है।

फ़ास्ट फॉरवर्ड टू सितम्बर 2018
देश में बहस जारी थी कि महिलाओं को सबरीमाला में प्रवेश की अनुमति मिलेगी या नहीं और इसी बीच उच्चतम न्यायालय अपना फैसला सुनाते हुए कहता है,

सबरीमाला में महिलाओं को ‘मासिक धर्म’ अनुभव करने के दौरान प्रवेश की अनुमति न दिया जाना, संविधान के खिलाफ है, और सभी महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

यह खबर आते ही देश में जैसे भूचाल आ गया, इस फैसले को लेकर लोगों के मत बंट गए और मीडिया में तरह-तरह की बातें आने लगी।

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न्यायालय का बहुमत का फैसला यह रहा कि, भगवान अयप्पा के भक्त एक अलग धार्मिक संप्रदाय का निर्माण नहीं करते हैं और महिलाओं पर लगाया गया प्रतिबन्ध (मंदिर में प्रवेश को लेकर) हिंदू धर्म का एक अनिवार्य हिस्सा नहीं है। अल्पमत देते हुए न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ​​ने लैंगिक समानता या व्यक्तिगत आजादी के टचस्टोन पर धार्मिक अभ्यास की समीक्षा नहीं करना चुना। उनका मानना था कि अदालत।

धार्मिकता के विचार के संबंध में अपनी नैतिकता या तर्कसंगतता को लागू नहीं कर सकती है

अदालत ने तमाम टिप्पणियां की, जिसमे से प्रमुख टिपण्णी यह रही कि जैविक (या शारीरिक) विशेषताओं या भिन्नताओं के चलते महिलाओं पर ऐसा प्रतिबन्ध लगाना, असंवैधानिक तर्क है। किसी भी व्यक्ति की आस्था और भक्ति, लिंग के रूढ़िवादों के अधीन नहीं हो सकती है। न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड ने कहा कि,

अशुद्धता के पारंपरिक विचारों के आसपास निर्मित कलंक को संवैधानिक मान्यता नहीं दी जा सकती है, और अशुद्धता की धारणा के आधार पर यह प्रतिबन्ध लगाना, अस्पृश्यता (untouchability) का एक रूप है।

न्यायमूर्ति रोहिंटन एफ. नरीमन का मानना था कि ‘कस्टम और उपयोग’ के आधार पर उपासकों द्वारा दावा किए गए मौलिक अधिकारों से महिलाओं को अपनी आस्था के हिसाब से धर्म का अभ्यास करने के मौलिक अधिकार को जन्म मिलना चाहिए।

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फैसले के बाद का भी आखिर क्यों महिलायें ठहराई जा रही हैं दोषी?
अबतक तो आप समझ गए होंगे कि आखिर क्यों महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की इजाजत देते हुए उच्चतम न्यायालय ने इस प्रतिबन्ध को अनुचित ठहराया और महिलाओं को उनके अधिकार से रूबरू करवाया। लेकिन अफ़सोस, अदालत महिलाओं के विक्टिमाइजेशन (शोषण) को रोकने में अनिवार्य रूप से असफल रहा। इस फैसले के बाद से लेकर अबतक करीब 11 महिलाएं इस मंदिर में प्रवेश करने की कोशिश कर चुकी हैं। लेकिन सभी असफल रही हैं, उन्हें अब भी विरोध का सामने करना पड़ रहा है और उसका कारण? हाँ, वही पुराना और ऐसा लगता है कि उच्चतम न्यायालय का फैसला मंदिर के बाहर तक ही लागू है, उसके अंदर नहीं। क्यूंकि अब भी महिलाएं अपने अधिकारों से वंचित हैं।

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रेहाना फातिमा, जिनकी बात हमने इस लेख के शुरआत में की, उनपर यह झूठे इल्जाम लगाए गए कि वो अयप्पा भगवान पर पीरियड्स के खून से भीगी सेनेटरी नैपकिन फेंकने जा रही थी। हालाँकि इस बात के कहीं कोई सबूत नहीं मिलते हैं, और न ही इस बात की किसी भी तौर पर आधिकारिक पुष्टि हो सकी। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह खबर महज़ इसलिए फैलाई गयी क्यूंकि एक महिला अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए सारी दकियानूसी प्रथाओं को तोड़ने के उद्देश्य से मंदिर में प्रवेश करने की इच्छा रखती थी। इस मसले पर जब पत्रकार सर्वप्रिया सांगवान ने TheNewsMinute की एडिटर इन चीफ से संपर्क करके इस खबर की सच्चाई के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि यह खबर झूठी है और न ही प्रशासन ने और न ही पुलिस ने ऐसा कुछ भी रिपोर्ट किया।

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एक और किस्सा, एक महिला पत्रकार का है जिन्हे मंदिर के आसपास के माहौल के बारे में रिपोर्टिंग करते वक़्त विरोध का सामना करना पड़ा, उनकी मीडिया वैन को तोड़ दिया गया और उन्हें भयभीत करते हुए वहां से भगा दिया गया। उस निर्भीक पत्रकार पर भी मंदिर की प्रथाओं से खिलवाड़ करने का आरोप लगाया गया और तरह तरह की अफवाह फैलाई गयी। सीएनबीसी18 की पत्रकार राधिका रामास्वामी ने इस पूरे मामले के घटने के बाद कहा कि,

हमने हमारी रिपोर्टिंग का विरोध करने वाले लोगों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बारे में बताया जिसके बाद भीड़ और भड़क उठी और वो हमपर पत्थर फेंकने लगे, अगर हम थोड़ी देर और वहां रुकते तो शायद हमारी लिंचिंग हो जाती।

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यही हाल इंडिया टुडे टीवी में डिप्टी एडिटर मौसमी सिंह के साथ हुआ, जिनपर हमला हुआ और उन्हें पास के एक अस्पताल तक जाने के लिए मजबूर होना पड़ा।

यह है हमारा देश जहाँ धर्म के आगे उच्चतम न्यायालय का फैसला भी बौना साबित होते हुए दिखता है और महिलाओं को अपने अधिकार हासिल करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यही नहीं एक अनुचित धार्मिक प्रथा को बचाने के लिए प्रयासों को अंजाम दिया जा रहा है। यह सब देखते हुए कार्ल मार्क्स की एक बात बहुत प्रासंगिक मालूम पड़ती है कि, “धर्म, लोगों का अफीम है”। हालाँकि यह बात बिलकुल सही है कि कोई भी धर्म अपने आप में बुरा नहीं, लेकिन हम उस धर्म के परिपालन की दिशा में किन प्रथाओं को जन्म देते हैं, यह देखने की जरुरत है। महिलाओं को दोयम दर्जे का मानव समझने वाली इस अनुचित प्रथा को जड़ से उखाड़कर फेंकना, एक बेहतर निर्णय है और हम सबको इस फैसले का विरोध न करते हुए महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करने की जरुरत है।

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Sparsh Upadhyay

एक विचाराधीन कैदी हूँ। कानून की पढ़ाई भी की है। जितना पढ़ता हूँ, कोशिश रहती है कि उतना ही लिखूं भी। सच्चाई, ईमानदारी और प्रेम को दुनिया की सबसे बड़ी ताकत समझता हूँ।

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