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पाकिस्तान से जेल की सजा काट कर लौटे हामिद अंसारी को मिला था इस मानवाधिकार-वकील का साथ: रक्षंदा नाज़, जिनपर है भारत को नाज़

इंसानियत का कोई तय धर्म नहीं होता, यह स्वयं में एक धर्म है। यह वो गुण है जो व्यक्ति विशेष को औरों से अलग करदेता है। आज की कहानी ऐसी ही एक महिला वकील की है जिन्होंने एक बार फिर साबित करदिया कि इंसानियत किसी सरहद के भीतर कैद नहीं रहती। यह कहानी है पाकिस्तान मूल की रक्षंदा नाज़ की, जिन्होंने हाल में पाकिस्तान द्वारा रिहा गए भारतीय, हामिद अंसारी की विशेष तौर पर मदद की।

33 वर्षीय हामिद अंसारी को इसी हफ्ते, पेशावर में एक जेल से रिहा कर दिया गया है। छह साल तक पाकिस्तान में कैद रहने के बाद अंततः उन्हें भारत भेजा गया। अफगानिस्तान से अवैध रूप से पाकिस्तान में प्रवेश करने के लिए उन्हें वर्ष 2012 में गिरफ्तार किया गया था। उनके द्वारा अवैध रूप से पाकिस्तान में प्रवेश करने का कारण, एक लड़की से मुलाकात करना था, जिससे उन्होंने ऑनलाइन मित्रता की थी।

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चूँकि वो अवैध रूप से पाकिस्तान में घुसे थे इसलिए उन्हें प्रथम दृष्टया एक भारतीय जासूस समझा गया, हालाँकि पाकिस्तानी ख़ुफ़िया विभाग एवं पुलिस को इस बात को लेकर सबूत नहीं मिले। हालाँकि फ़र्ज़ी पाकिस्तानी पहचान पत्र रखने के जुर्म में उन्हें 3 वर्ष की कारावास सुनाई गयी। और यह कारावास उनके लिए नर्क से भी बदतर रहा।

स्वयं हामिद अंसारी के शब्दों में,

मुझे नहीं पता होता था कि वहां कब दिन हुआ या कब रात हुई। मुझे 24 घंटों में, केवल एक मिनट के लिए वाशरूम में ले जाया जाता था। भोजन भी केवल नाम का था। मैं चालीस दिनों तक स्नान नहीं कर पाता था। मैं कई-कई दिनों तक बिना भोजन के रहता था। गर्मियों के दौरान, मुझे स्नान करने की अनुमति नहीं थी और मैं अपने शरीर तक को देख नहीं सकता था, क्योंकि मेरे शरीर में कीड़े लग जाते थे। उस समय के दौरान जब मुझसे पूछताछ की गई, मुझ पर कई प्रकार के अत्याचार बीते, मेरी बायीं आंख की रेटिना तक फट गयी थी। कई बार मैं बेहोश हो जाता था और कभी-कभी मैं रक्त थूकता था।

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उनकी इस दर्द भरी दास्ताँ में वो शुरआत में तो अकेले थे लेकिन उन्हें जल्द ही एक साथी मिलने वाला था। एक ऐसा साथी जो उनकी रिहाई को लेकर प्रतिबद्ध था। इस साथी का नाम था रक्षंदा नाज़, जो एक पाकिस्तानी मानवाधिकार अधिवक्ता हैं और तमाम कैदियों की निशुल्क सेवा करती हैं। हामिद अंसारी बताते हैं,

रक्षंदा नाज़, मेरी रक्षक बनकर उभरी और मेरा केस लड़ने के लिए स्वयं आगे आयीं और उन्ही की बदौलत अदालत में यह साबित हुआ कि यह जासूसी का मामला नहीं था।

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रक्षंदा नाज़ को, जो हामिद अंसारी की रीढ़ बनी रहीं, तमाम तरह की धमकियाँ भी मिली कि आखिर क्यों वो एक भारतीय के केस को लड़ रही हैं लेकिन वो पीछे नहीं हटी। वो स्वयं कहती हैं,

मैंने प्रतिज्ञा की थी कि मैं व्यक्तिगत रूप से हामिद को जेल से रिहा होते देखूंगी।

उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने हामिद और उस महिला के बीच सभी चैट पढ़ी है और उसके बाद यह निश्चित हो गया था कि वह निर्दोष थे।

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खैबर-पख्तुनख्वा और संघीय प्रशासित जनजातीय क्षेत्रों में महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाली रक्षंदा, हाशिए पर छोड़ दिए गए समुदायों के साथ काम करती हैं और वो तमाम मौकों पर महिलाओं को उनका हक़ दिलाने में कामयाब रही हैं।

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नाज़, कानूनी सहायता और जागरूकता सेवाओं का सञ्चालन करती हैं, जहां कानूनी पृष्ठभूमि वाली महिलाओं को वास्तविक कानूनी लड़ाई में लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।

नाज़ को इस मामले की जानकारी सबसे पहले, दिल्ली में मानवाधिकारों के लिए लड़ रहे कार्यकर्ताओं से मिली। बाद में उन्हें इस मामले पर सभी दस्तावेज मिल गए और वकील काजी मोहम्मद अनवर के साथ उन्होंने हामिद के लिए काम करना शुरू कर दिया।

नाज़ बताती हैं कि, हामिद को पनीर बर्गर पसंद था, इसलिए उन्होंने बर्गर, चावल और दूध को जेल में ले जाने की विशेष अनुमति प्राप्त की। कई मौकों पर, जैसे जब हामिद अस्पताल में भर्ती थे, तो उन्होंने व्यक्तिगत रूप से उनकी देखभाल की।

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हामिद की मां, फौजिया नियमित रूप से नाज़ से हामिद का हाल-चाल लेती रहती थी। दरअसल नाज़ ने हामिद की एक अभिभावक के रूप में सेवा देखभाल की।

आज जब हामिद वापस अपने देश आ गए हैं, वो नाज़ को नहीं भूले। वो यह मानते हैं कि अगर नाज़ नहीं होती तो शायद वो कभी भारत न लौट पाते। नाज़ का हामिद के प्रति एक सकारात्मक रवैया अपने आप में एक नज़ीर है कि इंसानियत हर उस जगह पनप सकती है जहाँ उसकी जरुरत है, बस हम यह बात समझ सकें।

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Image Courtesy: Hindustan Times

फोन पर इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए रक्षंदा नाज़ ने कहा,

जब मैं पहली बार हामिद से मिली तो उनके पास चश्मा तक नहीं था। वह ठीक से देख नहीं सकते थे। वह मुझे देख कर डर गए कि एक बूढ़ी औरत जेल में उनके पास आ रही थी। और फिर, जब भारत पहुंचने के बाद मैंने उनसे बात की, तो हम उस याद पर खिलखिला कर हँसे।

हम रक्षंदा का पूरे भारत की ओर से शुक्रिया अदा करते हैं कि उन्होंने हमारे एक नागरिक की निस्वार्थ भाव से सेवा की और एक बेटे को उसकी माँ से मिलवाने में मदद करते हुए एक अन्याय होने से बचा लिया।

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Sparsh Upadhyay

एक विचाराधीन कैदी हूँ। कानून की पढ़ाई भी की है। जितना पढ़ता हूँ, कोशिश रहती है कि उतना ही लिखूं भी। सच्चाई, ईमानदारी और प्रेम को दुनिया की सबसे बड़ी ताकत समझता हूँ।

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